गुजरात के
मुख्यमंत्री ने अपने प्रदेश मे भले ही विकास के नये आयाम भले बना लिये हों, लेकिन उनकी
जो हिन्दुत्व के पोस्टर बौय की छवि है वह अब भी बरकरार है। नरेन्द्र मोदी अब
अपनी छवि को किस दिशा मे ले जाना चाहते हैं, यह देखना दिलचस्प रहेगा।
भारतीय
राजनीति मे शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो नरेन्द्र मोदी से ज़्यादा चर्चित
होगा। इसलिये जब 11 जुलाई को मोदी ने रमज़ान की शुभकामनायें दीं, तो शिवसेना के
माउथपीस सामना अखबार मे उन पर इस भयंकर कटाक्ष किया गया। पर मोदी
तो मोदी है। अगले ही दिन जुम्मे पर उन्होने रौयटर्स को इंटरव्यू देकर अपने
विवादास्पद बयान से अपने कोर हिन्दुत्व छवि को दोबारा फोकस मे ला दिया। आलम यह
रहा कि तब से अब तक पूरी बीजेपी उनके बयान की सफाई देती फिर रही है।
2002 गोधरा काण्ड और उसके बाद हुए दंगों ने नरेन्द्र मोदी पूरे संघ परिवार के आंखों को तारा बना दिया। यह सिलसिला 2007 विधानसभा चुनावों तक चला। लेकिन उसके बाद मोदी ने अपनी विकास पुरूष की छवि
को सटीक तरीके से उभारा। उनका नाम राष्ट्रीय नेताओं मे शुमार हो गया। लेकिन
सवाल यह है कि आखिर मोदी की लाइन है क्या।
नरेन्द्र
मोदी जहां एक ओर 2002 के दाग को मिटाना भी चाहते हैं...लेकिन अगर वह केवल विकास के
नाम पर चुनाव लड़ेंगे...तो उनका कोर हिन्दुत्व वोट उनसे नाराज़ हो सकता
है...इसीलिये यह माना जा रहा है...कि वह दोनों मुद्दों को साथ साथ लेकर 2014
चुनावों का शंखनाद करेंगे।
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